Dec 30, 2008

फिर .. शायद.....

इश्क की बेडी का बल कलाई पर पड़ गया शायद
या फिर ख्वाब में वो मेरी कलाई पकड़ गया शायद

गली के इक मकान में फिर दो बुजुर्ग रहने आए
लगता है फिर कहीं कोई लाडला बिगड़ गया शायद

फिर कोई बूढा ऐनक लगा ढूंढ रहा तिनके
फिर घोंसले से बच्चा नहीं, पंछी उड़ गया शायद

सुना था नया 'फ़ोन' लोगों के फासले कम कर देगा
मगर हाथ से फ़ोन का फासला बढ़ गया शायद

कहते हैं वो आजकल फिर फूल खरीदने लगा है
मेरे बाद उसका घर फिर किराये पे चढ़ गया शायद

फिर दर पर उसकी आहट सुनी, दस्तक न सुनी
आज फिर वो लौट गया, आज फिर अड गया शायद

फिर दिल से उठी कराह, आंसू न बना, ग़ज़ल बनी
फिर दिल में तेरी याद का बादल घुमड़ गया शायद

फिर दिल से उठी कराह, आंसू बना, ग़ज़ल भी बनी
फिर इक बार आंसू उँगलियों से झड़ गया शायद

फिर दिल से उठी कराह, फिर तेरी दुआ निकली
भूली सितम, फिर तुझपे प्यार उमड़ गया शायद

दिल को पुकारूँ अपने तो गूंजता है नाम तेरा
लगता है ये दिल अब सचमुच उजड़ गया शायद

राहो-मंजिल पर वो नहीं उसके नक्शे-पा हैं हरसू
वो मंजिल से आगे, बहुत आगे बढ़ गया शायद

है जिद पे अडा, याद जाए तो ग़ज़ल हो ख़तम
दिले-नादां मेरा अज फिर ख़ुद ही से लड़ गया शायद

~RC
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