Nov 27, 2008

Aisa kyaa doosra hai koii

इमां गुनाह शीरीं जुबां कितना खरा है कोई
बुरा है जो, गर बुरा दिखे, तो क्या बुरा है कोई

बेहिजाब सी हों बातें पर फितरत बे-गैरत नहीं
अदा है ये परखने की कितना गिरा है कोई

ना कर गुमां, है बादशा, ख़बर तेरे खजानों की
ज़ाकिर तेरे सौ बन्दों में काफिर ज़रा है कोई

तल्खी तेरी, तेरे गुनाह इक ज़ख्म की बदौलत है
समझ सका तुझको ऐसा क्या दूसरा है कोई

तेरी तल्खी तेरी ज़फा से इश्क ये नाशाद नहीं
शिद्दत से यूँ इश्क में तेरे सरफिरा है कोई

तनहा घर यादें बिस्तर, मुन्तजिर से दिन हैं बसर
इश्क में यूँ दीवानों का क्या आसरा है कोई

3 comments:

BrijmohanShrivastava said...

तन्हा घर में एक तो सहारा आईने का होता है ""शायद इस घर में जानता है कोई"" {किसी की गजल का शेर }
ईमान जिसका गुनाह है वो मीठा बोलते ही है = फितरत से बेगैरत नहीं तो उस पर भरोसा किया जासकता है /गुमान न करने वाला सूफी शेर -शिक्षाप्रद / तारीफ योग्य है लेकिन कैसे तारीफ की जाए क्योंकि नाजानकार यदि शेर की गहराई में न जाकर वाह वाह करदे तो उस से शायर को खुशी नहीं बल्कि तकलीफ होती है

RC said...

"नाजानकार यदि शेर की गहराई में न जाकर वाह वाह करदे तो उस से शायर को खुशी नहीं बल्कि तकलीफ होती है" ... सही कहा बृजमोहन जी ॥
यूँ तो मुझे अपनी लेखन की खामियां मालूम है, मगर उस पर भी मुझे personally यह रचना ख़ास पसंद नहीं आई | कुछ खटक रहा है ...

nitin mahajan said...

nice