Nov 14, 2008

शब्दहीन हूँ ...

शब्दहीन हूँ अपने लिए आज उस तरह
थी निरुत्तर इक दिन मैं सब को जिस तरह
किए उन्होंने प्रश्न तेरे जाने पे किस तरह
ख़ुद मैंने भी न पूछे तुझसे उस तरह
......विश्वास मेरा मुझे कहता है इन जैसी नहीं हूँ मैं

जब जा रही थी जां तब तो कोई न आया
जा रहा था प्यार तो अपनों ने भी रुलाया
शोक मनाने लेकिन चौथे हर कोई आया
यही रोये सारे के मैंने क्यों न बचाया
......ये कहते मुझको 'अपनी', पर उनकी कहाँ हूँ मैं

अब लोग कहे न जता उसे अब-भी लगाव है
इस दुनिया में घाव के बदले सब देते घाव है
तू भी वार कर, खेल के जैसा खेला वो दांव है
मैं सोचूँ के ये प्यार कहाँ, ये तो अहंभाव* है
......'अहम्'* ये सुनकर कहने लगा के 'तुझे में नहीं हूँ मैं'

क्यों सब कहते मैं हार गई, उसकी ये जीत है
जो भागे है वो आगे है, दुनिया की रीत है
कैसे समझाऊँ ये दौड़ नहीं ये मेरी प्रीत है
जो खुश है वो मेरी हार में, मेरी भी जीत है
......फिर भी हठ है तो लो सुन लो के, हार गई हूँ मैं

प्रीत हुई इक बार मन में अब ये कैसा क्लेश
प्रीत हो जब कोई लगे भला वरना रखते हैं द्वेष ?
गणित ये जग समझ न पायी, जाने कैसा ये पेंच
मैं तो न बदलूँ , बदले दुनिया, चाहे बदले ईश
......प्रीत कहे इस जग में क्या अब कहीं नहीं हूँ मैं ?

10 comments:

Abhishek said...

मैं तो न बदलूँ , बदले दुनिया, चाहे बदले ईश
......प्रीत कहे इस जग में क्या अब कहीं नहीं हूँ मैं ?
काफी अलग है आपके लिखने की शैली और यह कविता भी. स्वागत मेरे ब्लॉग पर भी.

डॉ .अनुराग said...

क्यों सब कहते मैं हार गई, उसकी ये जीत है
जो भागे है वो आगे है, दुनिया की रीत है
कैसे समझाऊँ ये दौड़ नहीं ये मेरी प्रीत है
जो खुश है वो मेरी हार में, मेरी भी जीत है
......फिर भी हठ है तो लो सुन लो के, हार गई हूँ मैं


गीत सी है ये कविता ......उदास भी थोडी सी......

singhsdm said...

ब्लॉग पर आकर मन प्रशन्न हो गया ऐसा लगा कि हवा के ठंडे झोंके आ गए हो ...कविता में लिखे सारे हर्फ़ मन को छू गए . आगे भी लिखती रहिये.आपके ब्लॉग पर आकर अच्छा लगा.

pallavi trivedi said...

अब लोग कहे न जता उसे अब-भी लगाव है
इस दुनिया में घाव के बदले सब देते घाव है
तू भी वार कर, खेल के जैसा खेला वो दांव है
मैं सोचूँ के ये प्यार कहाँ, ये तो अहंभाव* है
......'अहम्'* ये सुनकर कहने लगा के 'तुझे में नहीं हूँ मैं'

ek alag aur sundar shaili....

गौतम राजरिशी said...

प्रीत हुई इक बार मन में अब ये कैसा क्लेश
प्रीत हो जब कोई लगे भला वरना रखते हैं द्वेष ?
गणित ये जग समझ न पायी, जाने कैसा ये पेंच
.....
jaane kyaa kyaa kahte ye shabd---ye saare shabd,
gaharaaiyo tak chutee ...gaharaaiyo tak utartee

प्रदीप मानोरिया said...

लाजाब गहरे भाव उत्तम शब्द रचना धनयबाद समय निकल कर मेरे ब्लॉग पर पधारे आपका स्वागत है

BrijmohanShrivastava said...

पहले निरुत्तर होना फ़िर शब्दहीन हो जाना /सिर्फ़ एक ही लाइन पर्याप्त थी पाठकों को विचार करने के लिए कि ""आपके जाने पर मैंने भी आपसे जितने सवाल नही किए जितने लोग अब मुझसे कर रहे है "" आपकी रचना पढ़ कर मुझे जनाब अहमद फ़राज़ साहब याद आरहे हैं तू मुझसे खफा है ये तुझे और मुझे पता है मगर जमाने को तो पता नहीं है /दूसरी बात जब जान जा रही थी तब कोई न आया बहुत भावुक ""जो रात दिन मेरे मरने की कर रहे थे दुआ -वो रो रहे है ज़नाजे पे हिचकियाँ लेकर " दुनिया वाले घाव के बदले घाव ही नही देते बल्कि नमक भी छिड़कते है और हम हैं कि फिर भी प्यार जताए जाते है और कहे जाते है ""नमक मेरे जख्मों पे हसं हंस के छिड़को -सितम भी इनायत नुमा चाहता हूँ ""सबका रोना के मैंने क्यों नहीं बचाया ++तमाशा देख रहे थे जो डूबने का मेरे -मेरी तलाश में निकले हैं कश्तियाँ लेकर ""यहाँ लोग खेल जैसा बार नहीं करते बल्कि ऐसा करते हैं कि "" वो अगर जहर देता तो सबकी नज़र में आजाता ,तो किया यूँ कि वक्त पे मुझे दवाएं न दीं ""

विनय said...

RC जी आपकी कविता पढ़ी तो बस मंत्रमुग्ध हो गये!

RC said...

Thanks, people!
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Brijmohan ji - You always overwhlem me by the detail analysis you do on my poems! (Well, though at times what you understand is not what the Poem/She'r says, but looking at your shiddat I dont want to correct you. Some things are beautiful in its pure, 'khaalis' form, right? :-) Thanks once again....

योगेन्द्र मौदगिल said...

Wah....
udgaron ko tolti rachna..
badhai..