Nov 18, 2008

इक ज़रूरत थी.... इक ज़रूरत है ...

कुछ तेरी भी फितरत थी, कुछ मेरी मुहब्बत है
इक तेरी ज़रूरत थी, इक मेरी ज़रूरत है

इक चाँद का सफर था, अब कड़ी धूप की राहें
इक शब् की ज़रूरत थी, इक रब की ज़रूरत है**
(**the night needed it then, now God needs it)

सच से लरजकर भी तेरे ख़्वाबों से ही सोती हूँ
इक होश की ज़रूरत थी, इक नींद की ज़रूरत है
(**the senses needs that, the sleep needs this)

तू लाख बुरा हो जाना ये इश्क नहीं कम होगा
इक यार की ज़रूरत थी इक यार की ज़रूरत है

तेरी यादों में थी जीती, अब शेरों में भी लिखती हूँ
इक जीस्त की ज़रूरत थी, इक रूह की ज़रूरत है

मेरे यार का जाना मेरा आँसू न बहाना
इक 'बख्त'* की ज़रूरत थी, इक वक्त की ज़रूरत है
(**was needed for good fortune, now the 'time' needs this)
(बख्त =good fortune)

इक जिस्म की ज़रूरत थी, इक दिल की ज़रूरत है
कुछ तेरी भी फितरत थी, कुछ मेरी मुहब्बत है

--------

15 comments:

BrijmohanShrivastava said...

यह नितांत सत्य है कि किसी भी बात पर दो मत हो सकते हैं /जुदा होने के फैसले द्वारा रिश्तों की हिफाज़त करने वाली बात इतनी उम्दा लगी कि लिखने को शब्द नहीं है /जिसे उम्र लगी बनने में -प्रत्येक क्षण अमानत है बहुत दार्शनिक चिंतन है (तमाम उम्र तिनका तिनका इकट्ठा किया एक नशेमन बनाया वह जरासी रौशनी के लिए जल जाता है} /वक्त की बात है कि जिसपर हुकूमत की वह भी बहक जाता है (वक्त की बात है कि साये भी मुंह खोलने लगे }रब ने एक काम बहुत अच्छा किया है /किसी को खुशी किसी को आंसू यही तो उसकी फितरत है (निजाम -ऐ मयकदा उसका इस कदर बिगडा है कि उसी को जाम मिलते हैं जिसे पीना नहीं आता और उसी को हंसी देता है जिसे हँसना नहीं आता ) जफा पर शिकायत न करना बहुत सुंदर अभिव्यक्ति है /गम में निकले हुए शेर को बगावत कहना ये जमाने का चलन है (हिम्मत से सच कहो तो बुरा मानते है लोग ,रो रो के बात करने की आदत नहीं मुझे )खुदा को तो यकीन करना ही पड़ेगा

गौतम राजरिशी said...

अलग सी रचना ये....बहुत कुछ कह्ती
तेरे सच से लरजकर भी ख़्वाबों से ही सोती हूँ
इक होश की ज़रूरत थी, इक नींद की ज़रूरत है

..और इन दो पंक्तियों ने सब कसर पुरी कर दी

सुभान्ल्लाह

shardul said...

इक चाँद का सफर था, अब कड़ी धूप की राहें
इक शब् की ज़रूरत थी, इक रब की ज़रूरत है

!!!!!!!!!!!!

डॉ .अनुराग said...

इक चाँद का सफर था, अब कड़ी धूप की राहें
इक शब् की ज़रूरत थी, इक रब की ज़रूरत है

सच से लरजकर भी तेरे ख़्वाबों से ही सोती हूँ
इक होश की ज़रूरत थी, इक नींद की ज़रूरत है

तू लाख बुरा हो जाना ये इश्क नहीं कम होगा
इक यार की ज़रूरत थी इक यार की ज़रूरत है

तेरी यादों में थी जीती, अब शेरों में भी लिखती हूँ
इक जीस्त की ज़रूरत थी, इक रूह की ज़रूरत है




इक जिस्म की ज़रूरत थी, इक दिल की ज़रूरत है
कुछ तेरी भी फितरत थी, कुछ मेरी मुहब्बत है






क्या कहने ...हर शेर अपने आप में मुकम्मल है .वाकई !

bhoothnath said...

तेरे सच से लरजकर भी ख़्वाबों से ही सोती हूँ
इक होश की ज़रूरत थी, इक नींद की ज़रूरत है
तू लाख बुरा हो जाना ये इश्क नहीं कम होगा
इक यार की ज़रूरत थी इक यार की ज़रूरत है

तेरी यादों में थी जीती, अब शेरों में भी लिखती हूँ
इक जीस्त की ज़रूरत थी, इक रूह की ज़रूरत है
adbhut...sundar....taaji....aur kuch alag saa ahsaas deti huin....

योगेन्द्र मौदगिल said...

बहुत खूब कहा आपने... बधाई स्वीकारें..

Dr. Nazar Mahmood said...

कुछ तेरी भी फितरत थी, कुछ मेरी मुहब्बत है
इक तेरी ज़रूरत थी, इक मेरी ज़रूरत है



बहुत खूब .
बधाई

Abhijit Galgalikar said...

Magnanimous !!!

सतीश सक्सेना said...

आपके भाव गज़ब के हैं, शुभकामनायें !

BrijmohanShrivastava said...

मैंने जिस कविता पर टिप्पणी की थी वह कहाँ गई इतनी सुंदर कविता थी के क्या कहूं उसमें मुझे याद है ये लिखा था की खुदा ने जहाँ में भेज दिया उस पर मैंने लिखा था खुदा ने अच्छा किया /वर्तमान कविता में फिलहाल तो मैं इसमें उलझा हूँ के ""इक शब् की जरूरत थी इक रब की जरूरत है ""या तब शब् की जरूरत थी अब रब की जरूरत है ""आपकी कविता पढने के लिए बहुत गहराई में उतरना पड़ता है /होश की जरूरत थी नींद की जरूरत है /जिंदगी की जरूरत थी आत्मा की जरूरत है दो तीन दिन तो सोचने में ही लग जायेंगे -पिछली वाली कविता ब्लॉग में से हटना नही चाहिए थी उसमें एक चिंतन था एक दर्शन था -अंतस के अहसास को जगाने की कोशिश थी उसमें एक प्रवाह था लय थी खैर जो हुआ अच्छा हुआ लेकिन में उसे नोट नहीं कर पाया यह गलती हो गई

BrijmohanShrivastava said...

मैंने जिस कविता पर टिप्पणी की थी वह कहाँ गई इतनी सुंदर कविता थी के क्या कहूं उसमें मुझे याद है ये लिखा था की खुदा ने जहाँ में भेज दिया उस पर मैंने लिखा था खुदा ने अच्छा किया /वर्तमान कविता में फिलहाल तो मैं इसमें उलझा हूँ के ""इक शब् की जरूरत थी इक रब की जरूरत है ""या तब शब् की जरूरत थी अब रब की जरूरत है ""आपकी कविता पढने के लिए बहुत गहराई में उतरना पड़ता है /होश की जरूरत थी नींद की जरूरत है /जिंदगी की जरूरत थी आत्मा की जरूरत है दो तीन दिन तो सोचने में ही लग जायेंगे -पिछली वाली कविता ब्लॉग में से हटना नही चाहिए थी उसमें एक चिंतन था एक दर्शन था -अंतस के अहसास को जगाने की कोशिश थी उसमें एक प्रवाह था लय थी खैर जो हुआ अच्छा हुआ लेकिन में उसे नोट नहीं कर पाया यह गलती हो गई

RC said...

बहुत शुक्रिया !!

बृजमोहन जी .......
मुक्त छंद और छंद-बद्ध कविताओं में lएक बात यह आ जाती है .... मुक्त-छंद कविताओं की तरह भाव aलिखकर और सही शब्द लगाकर काम ख़त्म dनहीं हो जाता ... आगे उसे छंद में डालो, शब्दों में फेर बदल कांट-छाट करो के तरन्नुम में बैठे... कई काम होते हैं :)

जो आपने पढ़ी थी, वह सिर्फ़ 'ज़हन से निकले विचार' थे | A completely raw composition! मैं बस टाइप करके सेव करना चाहती थी, पता नही था आप मेरे ब्लॉग पर हैं !

ठीक है, आप कहते हैं तो जैसी है वैसी ही फ़िर पोस्ट कर देती हूँ ...
बहुत शुक्रिया !
RC

संदीप शर्मा Sandeep sharma said...

तेरी यादों में थी जीती, अब शेरों में भी लिखती हूँ
इक जीस्त की ज़रूरत थी, इक रूह की ज़रूरत है

मेरे यार का जाना मेरा आँसू न बहाना
इक 'बख्त'* की ज़रूरत थी, इक वक्त की ज़रूरत है...

सुंदर रचना...

shyam kori 'uday' said...

... बहुत प्रसंशनीय अभिव्यक्ति है।

poemsnpuja said...

इक जीस्त की जरूरत थी, एक रूह की जरूरत है...शब्द बहुत गहरे असर करते हैं आपके, ऐसे हिंडोले जैसे झूमते जज्बात...बेहतरीन रचना है.