Dec 10, 2008

आज फिर वही बात है

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आज फिर वही बात है .....

आज फिर कुछ बातें याद आई हैं
बेटी के स्कूल का कुछ सामान ...
किसी की शादी का तोहफा खरीदना ....
आफिस की मीटिंग में कहनी एक ज़रूरी बात ....
और ....
ज़हन में काफ़ी देर से घूमता
मुकम्मल होने को तरसता
एक खूबसूरत मिस्रा .....

सोचती हूँ एक कागज़ पर लिख लूँ
के भूल न जाऊं बातें जो याद आयीं हैं

मगर फिर वही गुज़ीदा* मजबूरी, वही बात है
आज फिर वही हालात है
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आज फिर आटे से सने हाथ हैं .............
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http://thatcoffee.blogspot.com
RC
Dec 09 2008, 9 pm

(*गुज़ीदा = ख़ुद चुनी हुई /chosen)
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4 comments:

bhoothnath said...

आज फिर आटे से सने हाथ हैं .............
एक लाइन ही सारे अर्थ को बदल कर रख देती है.....या यूँ कहूँ कि एक ही लाइन में इस कविता का अर्थ है....गहरा भी.....सारगर्भित भी.....तथ्य भी...सत्य भी...और विडम्बनापूर्ण भी.....सरल सी मगर अद्भुत कविता.....कोई टिप्पिनी नहीं करूंगा......!!

"SURE" said...

औरत तेरी यही कहानी..........वाली कविता तरोताजा हो गई ....रूपम जी आप की लेखनी से ऐसी रचना अच्छी नही लगती ....आपकी कलम बहुत दमदार है गलती से आज की हुई पोस्ट पहले पढ़ ली ......उसके विपरीत ये आटे में सने हुए हाथ .....खैर कविता में एक सोच एक सच तो है ही ....

गौतम राजरिशी said...

हैरान हूँ कि ये रचना मुझसे छूट कैसे गयी थी पहले

पढ़कर लगा गुलजार के दुसरे पहलु को पढ़ रहा हूँ

क्लाइमेक्स में हाथ का आटे से सना होना अवाक छोड़ देता है..

सिर्फ सुंदर कह कर छोड़ देना इस कविता की तारीफ में...????

अनुपम अग्रवाल said...

अद्भुत अभिव्यक्ति