Dec 10, 2008

अब दर्द नहीं होता .........

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और एक दिन वो मेरी गाड़ी के नीचे आ गया!
एक हादसा मेरे रोज़मर्रा के रास्ते पर हो गया !

उसका ज़ख्म गहरा था
मुझे दिख रहा था उसका खून बह रहा है
मगर मैं वहां से चल दिया

क्योंकि
ग़लती उसकी थी ...

उस दिन के बाद
मैं हर रोज़ उसे देखता
वहीँ सड़क के किनारे वो बैठा रहता
अपने खुले घाव लेकर

उसे दर्द होता था .................
और शायद ....
....... मुझे भी

फिर उसके ज़ख्म
नासूर होने लगे
पकने लगे ........ रिसने लगे

उसे चुभने लगे
और शायद .......
मुझे भी

उसका दर्द मुझसे देखा न गया
कुछ करना ज़रूरी था ....
हाँ ..
कुछ तो करना ज़रूरी था ...
इसलिए

... मैंने अपना रास्ता बदल दिया !

अब उसके ज़ख्मों में दर्द नहीं है ..............
........
अब मुझे भी दर्द नहीं होता !

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RC
Dec 23
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3 comments:

गौतम राजरिशी said...

क्या कहूं,....!!!!

BrijmohanShrivastava said...

आज की बात ने छू लिया दिल को भी आत्मा को भी /कभी मैंने भी ऐसा ही कुछ लिखने की कोशिश की थी की यात्रा में मेरी सीट के बगल में सीट के आभाव में एक दुर्बल बुढिया खड़ी कांप रही थी ,मुझसे उसका दर्द देखा नही गया तो मैं अपनी सीट पर आँख बंद करके सो गया

अनुपम अग्रवाल said...

जब से दर्द हद से निकला है
दिल भी शायद यूं पिघला है
आंसू अब सर्द भी नहीं होता
और अब दर्द भी नहीं होता