Dec 27, 2008

अंजामे-सफ़र तन्हाई का, अब क्या जाने होए ....

अंजामे-सफ़र तन्हाई का, अब क्या जाने होए
सर काँधे रखकर अपने ही कोई कैसे रोए

दामन छुडाना खाबों से कितना है नामुमकिन
पाया नहीं है जिसको कोई उसको कैसे खोए

तोड़कर टूटी नहीं जब बेरहमी की दीवारें
लिपट-लिपटकर इनसे जाने इश्क भी कितने रोए

इक वहम पे खुशियाँ चुरा रहे हैं राहों में इन्सा
मंजिल पर जाकर देखेंगे क्या क्या पाए, खोए

सींच लहू महका चमन, तूफां में ऐसा उजडा
मिटटी तक न रही बयां थे कितने सपने बोए

ज़खम है इतना गहरा के सिसकती हैं नींदें
कितने लमहे रोए जाने कितने लमहे सोए

RC

8 comments:

Bahadur Patel said...

bahut hi sundar rachana hai.badhai.

MUFLIS said...

"ik veham pe khushiyaaN chura rahe haiN raahoN meiN insaaN.." waah !
Hamesha hi ki tarah.. umda aur nafees lehjaa..ek achhi ghazal..!!
badhaaee .
---MUFLIS---

Pyaasa Sajal said...

teesre sher mein sudhar ki gunjaish hai...baaki bahut kamaal ke hai :)

गौतम राजरिशी said...

...और मुझे तो तीसरा शेर ही सबसे जबरद्स्त लगा है..."लिपट-लिपट कर इनसे जाने इश्क भी कितने रोए"

और मक्ते ने तो हाय नींद का सिसकना और लम्हों की गिनती ...
आपकी सोचें,मैम...क्या कहूं

BrijmohanShrivastava said...

नया साल आपको मंगलमय हो

Pyaasa Sajal said...

ek to iske alaawa baaki meter ke hisaab se perfect hai...but that wasnt the main thing

actually,"berahmi ki deewar se lipatna" mujhe utna sahi sense nahi laga...
I know that is done in desperation wen all attempts to break it down have failed,still...mujhe personally sahi nahi lag raha tha...personal opinion

nonetheless its an exceptional creation :)

"SURE" said...

जखम है इतना गहरा की सिसकती है नींदें
कितने लम्हे रोये जाने कितने लम्हे सोये
.....बहुत अच्छी ग़ज़ल लगी .नव वर्ष की मंगल कामनाये आपको सपरिवार

RC said...

Sajal ji .. you are right ... mujhe Behr mein theekse likhna nahin aata. This one is not in meter.

Rest ... apna apna khayaal hai. I respect yours.

God bless
RC