Dec 14, 2008

Couplet

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तूने कहा था वक्त ज़ख्म भर देगा, साल-दो-साल बिता दे
जाने कैसे बात याद आई, खैर आज तारिख क्या बता दे

14th December
RC

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15 Dec 6pm

इस बुत की लकीरें मेरे हाथों-सी बना, ऐ संग-तराश

फिर देखूं कब तक ये मन्दिर में खुदा बना रहता है

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7 comments:

BrijmohanShrivastava said...

बहुत ही कठिन बात कह दी /वक्त हर जख्म का मरहम है ये बहुत बार सुना पढ़ा मगर मेरे अनुभव में नहीं आया कि वक्त ने जख्म भरे हों ,हाँ कुछ कहीं अन्यत्र मन बहल जाने पर, कुछ देर जख्मों की याद अलवत्ता वक्त भुला देता है /बहुत ही अच्छा सवाल है उनसे, जो यह कहते हैं कि कुछ अरसा बिता दे /जब राम लक्ष्मण बन जा रहे थे वे दस पाँच किलो मीटर ही पहुंचे होंगे कि उर्मिला ने सास से पूछा मां १४ साल खत्म होने में अब कितना समय और बचा ?/साल दोसाल जिसको ब्रह्मा जी के साल दो साल जैसे बीतें उनके क्या तो वक्त और क्या तो जख्म भरेंगे

गौतम राजरिशी said...

क्या बात है..."लाजवाब",पढ़ते ही जो पहला उद्‍गार मुँह से निकला वो यही था

फिर से "लाजवाब"

कभी-कभी कुछ अच्छे मिस्‍रों को पढ़ कर जो एक ख्याल उभरता है कि कितनी सच्ची बात को कितने प्यारे अंदाज में कहा गया है...

डॉ .अनुराग said...

बहुत खूब.....

Kavi Kulwant said...

lagta hai.. das saal beet gaye hain.. pura ek dasak...

BrijmohanShrivastava said...

वो हाथ की लकीरों से नहीं कर्मों से मन्दिर में बैठा है

MUFLIS said...

...sang.traash se kiya gya swaal
aapke vishwaas se chhota hi jaan parhta hai...aapka jazba aur aapka
lehjaa dono hi bahot pakeeza haiN,

couplet is captivating !
congrats !!
---MUFLIS---

योगेन्द्र मौदगिल said...

वाहवा.... बहुत ही सुंदर भावाभिव्यक्ति. वाह... बधाई आपको....
bitiya ko pyaar. kal ek kavita uske liye.....