Dec 2, 2008

ऐ दोस्त तू मेरे साथ न चल

सख्त मरहले कठिन सफर ..... ऐ दोस्त तू मेरे साथ न चल
कब हो जाने राह ख़तम ..... ऐ दोस्त तू मेरे साथ न चल

राह में मेरी धूप बहुत है
छाँव है ना कोई राहत है
मुझे तो जलने की आदत है
फ़िर भी चलने की ताक़त है
तू भी मेरे साथ न जल .... ऐ दोस्त तू मेरे साथ न चल

मेरी राहों में कितने पत्थर
काँटों भरा है कठिन सफर
चुभन कभी, कभी ठोकर
मेरे संग चलने की जिद न कर
गिरने से पहले तू संभल ............ ऐ दोस्त तू मेरे साथ न चल

क्यों अपनों से ही फुरक़त है
क्यों ज़िंदगी सिकालत है
क्यों सोहबत की ज़रूरत है
क्यों तुझको मेरी आदत है
मैं आज तो हूँ गर ना हूँ कल ............ ऐ दोस्त तू मेरे साथ न चल

सराब हूँ मैं बदअख्तर
ना हूँ मैं काबिले-रहबर
शहद है तू और मैं ज़हर
अंजाम से इस आगाज़ के डर
इस मोड़ से अपनी राह बदल ..... ऐ दोस्त तू मरे साथ न चल

सियाह राह बिना मश 'अल ... यहाँ सऊबतें* हो और मुश्कल
मेरी रहगुज़र है यूँ ही अज़ल ......ऐ दोस्त तू मेरे साथ न चल

......ऐ दोस्त तू मेरे साथ न चल

RC
Dec 02, 10 ऍम
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*स'ऊबतें=hardships
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1 comment:

गौतम राजरिशी said...

क्यों अपनों से ही फुरक़त है
क्यों ज़िंदगी सिकालत है
क्यों हाथ की मेरी ज़रूरत है
क्यों मेरी तुझको आदत है

....बहुत खूब