Dec 1, 2008

ghani_raat_ka_chaand

घनी रात का चाँद या सुनहरा सूरज
दिल तो मेरा भी करता है
इस धूप को हथेली पर रक्खूँ
इस चाँद को महसूस करूं
और बाकी सब की तरह
इन्हें लफ्जों में पिरोऊँ

मगर तुम्हारे सिवा कोई
मुझे छू भी तो नहीं सकता

29 nov, 12 noon, on lucknow train

1 comment:

गौतम राजरिशी said...

उफ!!...इन मोहक रचना की सुंदरता इनके शब्दों के इस खुब्सुरत संयोजन के अलावा ये जो आखिरी में आपने एक ट्विस्ट दिया-गज़ल का है..