Dec 4, 2008

Mumbai Attacks

राहे-फितना* लम्हे कुछ बिता जाती है
ज़िन्दगी फ़िर राहे-आम आ जाती है

खौल के जिसने सुर्ख किया था लाल रंग का खूँ
आग वो बुजदिल पानी में समा जाती है

यूँ सियासत को देने तानों की कमी नहीं
बारी इंतेखाब* की फ़िर सच बता जाती है

तर्ज़* भी रिश्वत खाने का इस मुल्क में ऐसा है
यास* मौत की फ़र्ज़ को खिला जाती है

यूँ तो फ़िक्र न रिश्तों के निभाने की है
कारे-ज़माना* बचने सब निभा जाती है

बेकदर वो बेबस मौतें कुछ सिखा जाती है
औकात वो मेरी मुझको ही दिखा जाती है

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राहे-फितना = path of revolution
इंतेखाब = make a choice / election
तर्ज़ = fashion
यास = fear
कारे-ज़माना = making the society a better place to live
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10 comments:

डॉ .अनुराग said...

यूँ सियासत को देने तानों की कमी नहीं
बारी इंतेखाब* की फ़िर सब बता जाती है

तर्ज़* भी रिश्वत खाने का इस मुल्क में ऐसा है
यास* मौत की फ़र्ज़ को खिला जाती है

वाकई सच कहा आपने .जिंदगी की बेबसी दिखा दी..ओर इस शेर ने सबसे ज्यादा असर छोडा है

राहे-फितना* लम्हे कुछ बिता जाती है
ज़िन्दगी फ़िर राहे-आम आ जाती है

HEY PRABHU YEH TERA PATH said...

महोदयाजी।
बेक़द्र वो बेबस मौतें कुछ सिखा जाती है
औकात वो मेरी मुझको ही दिखा जाती

आज यह दर्द पुरे देशवासियो का है। आपने अपनी कविता मे जो बाते कही वो मेरे दिल को छू गई। आपके ब्लोग पर पहली बार आया। आपकी प्रतुति सटिक एवम अच्छी लगी। हार्दिक शुभकामऐ।

योगेन्द्र मौदगिल said...

अच्छी रचना के लिये बधाई स्वीकारें

BrijmohanShrivastava said...

कठिन शब्दों के आगे सितारे तो बने हैं किंतु उनके सरल शब्द (माने ) नहीं लिखे हैं

RC said...

बृजमोहन जी - मुआफ कीजिये ! मायने लिखे हुए थे मगर पता नही फॉण्ट कैसे बहुत छोटा हो गया ...
खैर, मैंने ठीक कर दिया है ॥
आप कृपया अपना ईमेल मुझे भेज सकते हैं ?

शुक्रिया !

गौतम राजरिशी said...

अब तक की आपकी बेहतरीन रचनाओं में से एक
वो दूसरा शेर थोड़ा सा बाऊंस कर गया मेरे ऊपर से

...सोच रहा हूं कि क्या कहना चाह रही हैं आप आग वो बुजदिल पानी में समा जाती है...

ok i give up...u tell me now

RC said...

Gautam ji ..

The revolutionary fire that we common men are feeling within us these days goes off when there is a need to act. Cuz people are coward. Buzdil.

Kya humein azaadi bahut saste mein mil gayi thi??

RC

BrijmohanShrivastava said...

rishwat wale sher jaise baat aaj tak kisee ne nahin kahi ,lekinmaut kaa dar frz ko khilane waalee baat pr mujhe vichar is wqt dimag men nahin aarahe hain

Vijay Kumar Sappatti said...

aapki ye gazal se bada sakun mila bhai ..

zindagi ke naye aayamo ko darshati hai ye gazal.specially ye lines

राहे-फितना* लम्हे कुछ बिता जाती है
ज़िन्दगी फ़िर राहे-आम आ जाती है


bahut bahut badhai..

vijay
http://poemsofvijay.blogspot.com/

bhoothnath said...

har line to maarak hai...poori gazal bahut kam hi aisi mukammal-si dekhi hai maine...sach...!!