Dec 18, 2008

बशीर बद्र - My favorites

मैं ग़ज़ल कहूं, मैं ग़ज़ल पढूं, मुझे दे तो हुस्न-ए-ख़याल दे
मेरा गम ही है मेरी तरबियत*, मुझे दे तो रंज-ओ-मलाल दे

सभी चार दिन की है चांदनी, ये रियासतें, ये विजारातें*
मुझे उस फ़कीर की शान दे के ज़माना जिसकी मिसाल दे

मिरी सुबह तेरे सलाम से मिरी शाम है तेरे नाम से
तेरे दर को छोड़ के जाऊंगा ये ख़याल दिल से निकाल दे

मिरे सामने जो पहाड़ थे सभी सर झुका के चले गए
जिसे चाहे तू ये उरूज* दे, जिसे चाहे तू ये ज़वाल* दे

बड़े शौक से इन्ही पत्थरों पे शिकम* से बाँध के सो रहूँ
मुझे माल-ए-मुफ्त हराम है मुझे दे तो रिज़्क-ए-हलाल* दे

- बशीर बद्र
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तरबियत=training, प्रशिक्षण
विज़ारातें = कष्ट, दुःख
उरूज=progress
ज़वाल=deterioration, अवनति
शिक =stomach
रिजक--हलाल = a meal not disallowed by my religion

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5 comments:

swati said...

bahut sundar.............
swati

BrijmohanShrivastava said...

धन्यवाद /किसी दिन ""उस दर का दरवान बनादे या मौला "" यदि पोस्ट होगी तो नोट कर लूँगा लिखी तो थी मेरे पास /आप गुना में मुशायरे में कई मर्तवा तशरीफ़ ला चुके हैं तथा कृष्ण बिहारी नूर साहेब भी गुना पधार चुके है

मीत said...

Well ... well. Not many things that I happen to do make sense. This one did. Even if it was accidentally that I came here. But then, the question remains ... or .. rather extends .... does it exist even after that ..coffee ?

डॉ .अनुराग said...

shukriya ,he is my favourite too....

गौतम राजरिशी said...

बद्र जी के तो हम सब दीवाने हैं