Dec 26, 2008

रहम ..........

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सुसर को नई बहू के काम करने से शिकायत
और सास को रोटियाँ बनाने से

रस्मो-रिवाज़ तो निभा रही ....
न नौकरानी रखना अखर रहा था
मगर
बहू का बेवक्त काम करना
उसका लैपटॉप
आफिस के अंग्रेज़ी फ़ोन काल्स

लोग, मुहल्ले वाले क्या कहेंगे ?
बडे-बूढों ने टोक दिया तो ?
बिरादरी की मान-मर्यादा रख लेगी?

बेटे ने शिकायत सुनकर कहा
ठीक है, नौकरी नहीं करेगी
ना महीना पचास हज़ार आयेंगे ...

अगले दिन सास बाज़ार से कुछ समान ले आई
पतली-पतली खूबसूरत चुनरी
बहू को ओढ़ा दी और कहा

"तुझे काम छोड़ने की ज़रूरत नहीं
ये चुनरी ओढ़ ले
लैपटॉप का लैपटॉप दिखेगा
...
और घूंघट का घूंघट भी रहेगा !"

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RC
26 Dec
(Written while traveling in bus from Jaipur to Delhi.
Inspired & imagined from story of a Christian friend married to a hardcore Hindu family.)
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2 comments:

तरूश्री शर्मा said...

एक बढ़िया रचना। समाज के द्वंद्व का बेहतर प्रदर्शन। इन दिनों ये मसले आम हैं लेकिन खास समाधान या हल का विकल्प नहीं। बढ़िया रचना के लिए बधाई।

Deeps said...

kya solution hai ??