Jan 18, 2009

अंत .....................

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अंत
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कुछ ऐसा अजीब रिश्ता था वह
जैसे
मेरी दो हथेलियों को मिलाकर बने चाँद का
उसमें रखे दो घूँट चंचल पानी से ....

जिसे गर मैं पी भी लेती
तो प्यास न बुझती ...
या
जिसमें गर मैं अपना प्रतिबिंब ढूंढती
तो जब तक वो नज़र आता
मेरी ही उँगलियों के बीच की दरारों से होकर
मेरा अस्तित्व
बूँद-बूद गिरता नज़र आता ...!


उस पानी को
न गिरने से रोक सकती थी
ना उन हथेलियाँ अलग कर सकती थी
जो तेरे पानी के लिये मैंने जोड़ लीं थीं

गर ऐसे निर्मल प्रेम का अंत
बूँद-बूँद गिर कर ही होना है
तो वो उसी निर्गुण, निराकार के लिये गिरे
जिसने इस रिश्ते को बनाया था

अपने डूबते सूरज की तरफ़
ये हथेलियों का चाँद उठाकर
अब उंगलियाँ खोल दी है मैंने
और उस रिश्ते को ...
बूँद-बूँद कविताओं में
गिरने दे रही हूँ ...

.... एक
अर्घ्य देकर !

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RC
18 Jan, 1:18 am
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1 comment:

Dev said...

Aur us riste ko....
bund bund kavitao me
girane de rahi hoon.....

RC kya khaoo mai jo bhi aapki kavita , gazal ya poem padhata hoon , bas padhata hi rah jata hoon , aur usaki gaharayi me doob jata hoon...

Kitani khoobshurati se aapne man ke pure bhavo ko ek nadi ki tarha bahane diya hai aapne ....

I love ur poems, gazal aur kavita....

Regards...