Sep 9, 2010

पुनर्जन्म

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पुनर्जन्म
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सांझ ढलती रंगों जैसी बदल सकेगी ज़िन्दगी?
गीत खुशबू या ख़ुशी के लिख सकेगी, जिन्दगी?
दिल का शोर मुड़ गया है आँख से क़लम की ओर
.......... ज़िंदगी
की सिम्त भी क्या चल सकेगी ज़िन्दगी?


फूल की, बहार की, वो खुशनुमा से सालों की
सियासतों की, अर्थ की, ज़माने के बवालों की
वो सब जो मांगे है वजूदो-ज़िक्र मेरी नज़्म में
है आज पहली और आख़री दफा सवालों की

.......... हकीक़तों के तज़कीरों में ढल सकेगी ज़िन्दगी?
.......... ज़िंदगी की सिम्त भी क्या चल सकेगी ज़िन्दगी?

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सख्त पर्बतों की ओट में थी वो कहीं गडी
हिली धरा, पडी दरार, धार पानी की उडी
वो शब्दों की नहर जो भाव से मिली, नदी बनी
ये नज़्म फिर उगम से दूर सागर-ओर चल पडी

.......... क्या नदी उगम की ओर चल सकेगी, जिन्दगी?
.......... ज़िंदगी की सिम्त भी क्या चल सकेगी ज़िन्दगी?

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जी में आए कितनी बार तोड़ दूँ हदे-ख़याल
सूखे फूल खुशबू में मैं साँस लूँगी कितने साल
लूँ उड़ान बाज़-सी या तितली बनके रंग लूँ
हो मेरी नज़्म मेरे जैसी, इसमें भी दिखे जमाल!

.......... छंदमुक्त नज़्म सी क्या हो सकेगी ज़िन्दगी?

......... बन्धमुक्त बज़्म से क्या हो सकेगी ज़िन्दगी?
......... राहे-मौत से पलट के चल सकेगी ज़िन्दगी ?

........ जिन्दगी की सिम्त भी क्या चल सकेगी ज़िन्दगी?

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RC
May 06 2009, 6 25 PM
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1 comment:

डॉ .अनुराग said...

जिंदगी की सिम्त क्या चल सकेगी जिंदगी

..मुश्किल सवाल है ....यक्ष प्रशन सा !!!!