Dr. Rahat Indori
ये सर्द रातें भी बनकर अभी उड़ जायें
वो एक लिहाफ मैं ओढूँ तो सर्दियां उड़ जायें
ख़ुदा का शुक्र के मेरा मकान सलामत है
हैं इतनी तेज़ हवाएं के बस्तियाँ उड़ जायें
ज़मीन से एक त'आल्लुक ने बाँध रखा है
बदन में खून नहीं हो तो हड्डियां उड़ जायें
बिखर-बिखर सी गयी है किताब साँसों की
ये कागज़ात खुदा जाने कब कहाँ उड़ जायें
हवाएँ बाज़ कहाँ आतीं हैं शरारत से
सरों पे हाथ ना रखें तो पगड़ियाँ उड़ जायें
बहुत गरूर है दरिया को अपने होने पर
जो मेरी प्यास से उलझे तो धज्जियां उड़ जायें

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